भीलवाड़ा/रायपुर। न्यायालय में विचाराधीन विवाद के बीच प्रशासनिक सख्ती के दावों की हवा तब निकलती दिखी, जब कलेक्टर के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद विवादित भूखंड पर ग्राम पंचायत सचिव रोकने की कार्रवाई सिर्फ “फोन कॉल” तक सीमित रह गई।
जिला कलेक्टर के आदेश पर उपखण्ड अधिकारी रायपुर सहित दो अधिकारियों को तलब कर साफ कहा गया था कि न्यायालय के निर्णय तक निर्माण कार्य पूरी तरह रोका जाए। जिला परिषद के एसीएस ने भी यही निर्देश दोहराए। लेकिन जमीनी हकीकत—काम कुछ देर रुका, और कागजों में अब भी “स्वीकृति” जीवित!
ग्राम पंचायत सचिव अशोक मारू पर आरोप है कि उन्होंने आदेशों को लागू करने में 5 दिन तक टालमटोल की। पूछने पर जवाब—“काम रुकवा दिया गया है।”
लेकिन बड़ा सवाल—अगर काम रुक गया है तो **स्वीकृति निरस्त** के लिखित आदेश कहाँ हैं?
प्रार्थी ने जब स्वीकृति निरस्त की प्रति मांगी, तो उसे देने के बजाय कथित रूप से फटकार कर लौटा दिया गया। यानी न आदेश, न पारदर्शिता—सिर्फ आश्वासन!
सोमवार को जिला परिषद की जांच टीम मौके पर पहुंची, निरीक्षण किया और प्रार्थी से लिखित जवाब व दस्तावेज मांगे। प्रार्थी ने बिना नोटिस दस्तावेज देने से इनकार किया, हालांकि मौके पर सभी दस्तावेज दिखाए गए। इसके बावजूद आधिकारिक प्रक्रिया अब भी अधर में लटकी है।
मामले में विकास अधिकारी और सचिव स्तर पर आदेश जारी करने में हो रही देरी ने शक को और गहरा कर दिया है—
क्या यह सिर्फ लापरवाही है या किसी “बड़े हित” की रक्षा?
उधर उपखण्ड अधिकारी रायपुर करुणा लाडौती ने ग्राम विकास अधिकारी को पत्र लिखकर जिम्मेदारी आगे बढ़ा दी—यानि “गेंद दूसरे पाले में।”
कटाक्ष साफ है—
फोन पर काम रुकवा देना आसान है,
लेकिन फाइल में आदेश लिखना क्यों मुश्किल हो रहा है?
अब जनता पूछ रही है—
क्या कलेक्टर के आदेश सिर्फ दिखावे के लिए हैं?
क्या बिना लिखित निरस्तीकरण के कभी भी फिर से निर्माण शुरू नहीं होगा?
और क्या इस पूरे खेल में कहीं कोई मिलीभगत छिपी है?
फिलहाल मामला गरम है…
और असली परीक्षा अब प्रशासन की है—**एक्शन कागज पर दिखेगा या सिर्फ फोन पर ही चलता रहेगा?**








