भीलवाड़ा/रायपुर। प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करते हुए रायपुर क्षेत्र में एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां न्यायालय में विचाराधीन भूमि विवाद के बावजूद निर्माण कार्य धड़ल्ले से जारी है—और जिम्मेदार अधिकारी “सब ठीक है” कहकर पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं।
मामले में उपखंड अधिकारी रायपुर करुणा लाडौती द्वारा कथित रूप से ऐसा आदेश जारी किया गया, जिससे विवादित भूखण्ड पर निर्माण का रास्ता साफ हो गया। हैरानी की बात यह है कि जिस व्यक्ति का कब्जा था, उसे पुलिस के माध्यम से पाबंद करवा दिया गया, और दूसरी ओर उसी जमीन पर निर्माण कार्य बेरोकटोक शुरू हो गया।
फरियादी जब अपने पूरे दस्तावेजों के साथ जिला कलेक्टर जसमीत सिंह संधू के पास पहुंचा, तो कलेक्टर ने तुरंत संज्ञान लेते हुए 24 घंटे में जांच के आदेश दिए और उपखंड अधिकारी, तहसीलदार व ग्राम विकास अधिकारी की कमेटी गठित की। इतना ही नहीं, कलेक्टर ने साफ निर्देश दिए कि जब तक मामला स्पष्ट नहीं हो, तब तक निर्माण कार्य तुरंत रोका जाए।
लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है…
कलेक्टर के आदेशों के बावजूद मौके पर निर्माण कार्य लगातार जारी है।
जब इस पर उपखंड अधिकारी करुणा लाडौती से सवाल किया गया, तो जवाब और भी चौंकाने वाला था—
“मुझे नहीं पता कि काम रुका या नहीं… मेरा पत्र गलत समझा गया।”
यह बयान प्रशासनिक जिम्मेदारी पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
क्या एक अधिकारी सिर्फ “पत्र भेजने” तक ही सीमित है?
क्या जमीनी स्थिति की जिम्मेदारी किसी की नहीं?
और सबसे बड़ा सवाल—
जब खुद अधिकारी स्वीकार कर रही हैं कि उन्हें यह तक नहीं पता था कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है, तो फिर ऐसे आदेश किस आधार पर जारी किए गए?
ग्राम विकास अधिकारी पवन मंडोवरा को भी पत्र जारी हुआ, लेकिन उन्होंने कोई प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की—यह भी जांच का विषय बना हुआ है।
मामले में यह भी सामने आया कि बाद में “खानापूर्ति” के लिए एक और पत्र जारी कर दिया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।
अब सवाल सीधे-सीधे प्रशासन पर है—
क्या कलेक्टर के आदेशों की खुलेआम अवहेलना पर कोई सख्त कार्रवाई होगी?
क्या न्यायालय में लंबित मामले के बावजूद निर्माण करने वालों पर कार्रवाई होगी?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
कटाक्ष यही कहता है—
अगर आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएं और जमीन पर मनमानी चले…
तो फिर सिस्टम पर भरोसा आखिर कैसे कायम रहेगा?
फिलहाल, पूरे मामले में न्यायालय के फैसले का इंतजार है…
लेकिन उससे पहले यह देखना होगा कि प्रशासन खुद अपने आदेशों की कितनी “इज्जत” बचा पाता है।








